Sunday, September 28, 2008

शर्मिदा तो हम हैं

दिल्ली में हमेशा से एक मिक्स कल्चर रहा है. यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई और भी बहुत से मज़हब के लोग एक साथ रहते आए हैं. जनाब कैफी आज़मी साहब ने अपनी ऑडियो बुक कैफियत में सच कहा है की "मेरा दावा है की आज भी तमाम नफरतों के बावजूद, जो फैलाई हैं सियासत ने, एक हिंदू ऐसा नहीं ढूँढा जा सकता पूरे हिंदुस्तान में जिसके चार-छ या एक से ज़्यादा मुसलमान दोस्त न हो, और एक मुसलमान भी ऐसा नहीं ढूँढा जा सकता जिसके सौ-पचास हिंदू दोस्त न हों. लेकिन ये क्या बात है की जब चार हिंदू एक जगह बैठते हैं तो वो हिंदू हो जाते हैं और जब चार मुसलमान एक जगह बैठते हैं तो वो मुसलमान हो जाते हैं?"
दिल्ली का यही कल्चर है और दिल्ली वालो को दिलवाला भी इसी वजह से कहा जाता है की यहाँ मज़हब इबादत की चीज़ है और मज़हब के नाम पर दहशतगर्दी फैलाने वाले ये बात नहीं जानते. आज भी पुरानी दिल्ली की गलियों में भले ही ठंडक है मगर वहां अडोस-पड़ोस में रहने वालो के साथ जो रिश्तो की गर्मी है वो काबिल-ऐ-तारीफ़ है.
चर्खेवालन, दिल्ली में रहने वाले बताते हैं की जब भी वहां मज़हबी फसाद हुए हैं और कर्फ्यु के हालात बने हैं उन तमाम हालातो में बल्लीमारान और चर्खेवालन के उन लोगो का कोई वास्ता नहीं रहा है जिनकी वहां रिहाइश है. मज़हबी फसाद की वजह बनने वालो से लेकर उन फसादों में मरनेवाले तक इस इलाके के नहीं हैं. कुछ दहशत पसंद नेता वहां इस तरह के फसाद पैदा करते आए हैं.
अतीक ने जो कुछ भी किया सचमुच उसके लिए तमाम क़ौम को शर्मिंदा होना पड़ रहा है. वास्तव में अपने ही भाइयो को शर्मिंदा करके सबसे ज़्यादा शर्मिंदा तो हम हो रहे हैं. दिलशाद गार्डन मेट्रो स्टेशन पर चेक्किंग कर रहे सिपाही ने जब चार पाँच लोगो की सतही चेक्किंग की और एक नमाजी टोपी लगाये कुरता पायजामा पहने शख्स की बड़े ध्यान से तलाशी ली तो सच कहूँ मुझे शर्मिंदगी हो रही थी. बस महसूस ही कर सकता था की अगर कल कहीं बजरंग दल, शिव सेना, या विश्व हिंदू परिषद् की वजह से हमारे साथ ऐसा हुआ तो कितना बुरा लगेगा. चलिए भगवान् से प्रार्थना करते हैं की हमे इतनी शक्ति दें की इन को भटकाव के रास्ते पर जाने से रोक सकें.

1 comment:

Neha Arora said...

आपकी पोस्ट शर्मिदा तो हम हैं पढ़ कर अच्छा लगा , कृपया कुछ समय www.jagodelhi.com को भी दीजिये , धन्यवाद्

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