Sunday, October 5, 2008

सुखी दांपत्य का आधार - मेरा विचार - केवल प्यार

किसी मित्र ने विचार दिया की सुखी दांपत्य का एक ही नियम है. पति-पत्नी फैसले बाँट लें. मुल्ला नसरुद्दीन की शादी की पचास्वी सालगिरह थी. मैंने पूछा "मुल्ला पचास सालो में भी तुम्हारा अपनी पत्नी से झगडा नहीं हुआ?" मुल्ला ने जवाब दिया "नहीं, क्यूंकि छोटे-मोटे फैसले मेरी बीवी करती है और बड़े-बड़े फैसले मैं करता हूँ"। मैंने कहा "समझाओ तो ज़रा"। मुल्ला बोला "छोटे-मोटे फैसले जैसे हम कहाँ मकान खरीदेंगे, बच्चे किस स्कूल में पढेंगे, किस रिश्तेदार से कैसे ताल्लुक रखेंगे, घर में परदे-चादर वगेरह किस रंग के होंगे ये सब फैसले मेरी बीवी करती है और बड़े-बड़े फैसले जैसे भगवान् है की नहीं, इंसान के जन्म का क्या कारन है, मरने के बाद आदमी कहाँ जाता है वगेरह पर फैसले मैं करता हूँ."

आप ही की तरह मैं भी हंसा था क्यूंकि आज गृहस्थ जीवन को चलने की लिए सचमुच फार्मूलों की ज़रूरत पड़ती है। शादी एक सामंजस्य है, एक एडजस्टमेंट। सफल शादी के लिए फार्मूलों की तलाश हमेशा रहती है. क्या शादी के लिए सिर्फ़ पति-पत्नी में प्यार होना काफ़ी नहीं है? क्यूंकि जहाँ प्यार होगा वहां एडजस्टमेंट नहीं करनी पड़ेगी. वहां पति के रिश्तेदार पत्नी के लिए ज़रूरी होंगे और पत्नी के रिश्तेदार पति के लिए.

पति को हमेशा ये ख्याल रहेगा की मैं इस लड़की को इसके जन्म के रिश्तो से तोड़कर यहाँ अपने साथ लाया हूँ, उसके बावजूद भी ये मेरा कितना ख्याल रखती है। इसकी खुशी मुझसे है और मेरी खुशी इस से। इसकी सहेलिया और इसके साथी सब छूट गए हैं. मेरे सिवा अब इसका कोई नहीं है.

इसी तरह पत्नी को भी ये सोचना होगा की अब मैं अपना घर छोड़कर इस आदमी के घर आ गई हूँ। मेरी वजह से इन्हे अपनी पूरी ज़िन्दगी में बदलाव लाना होगा। इनको अब अपने हर फैसले में मुझे राय पूछनी होगी. शादी से पहले भले ही देर रात को घर आते थे मगर अब इनको देर से आने पर जवाब देना होगा की ये इतनी रात तक कहाँ थे. इनकी ज़िन्दगी अब दो हिस्सों में बंट गई है. मेरा और मेरे विचारों का सम्मान करना और मेरी ज़रूरतों को पूरा करना अब इनका फ़र्ज़ हो गया है.

इस तरह सोचने से ज़िन्दगी में फार्मूला ढूँढने की ज़रूरत नहीं रहेगी. जिस तरह दोस्ती का रिश्ता दिल से जुडा होता है जन्म से नहीं उसी तरह पति-पत्नी का रिश्ता भी दिल से जुडा होता है जन्म से नहीं. इसलिए मेरे विचार से सुखी दांपत्य जीवन का एक ही नियम है की शादी के बाद पति ख़ुद को पत्नी मानकर चले और पत्नी ख़ुद को पति की जगह पर रखकर देखे. यहाँ मेरा मतलब दोनों की जिम्मेदारिया बदल लेने से कतई नहीं है. यहाँ मतलब सिर्फ़ ये है की पति अपनी पत्नी में अपनी महबूबा को देखे और पत्नी अपने पति में अपने आशिक को. ज़िन्दगी सिर्फ़, सिर्फ़, और सिर्फ़ प्यार से सहारे चल सकती है.

5 comments:

sumnesh said...

mahoday aapki lekhni ki dhar kafi prbahvsali hai,budhhibi prkhar hai esme koi sandeh nahi, aap sakchar hain lekin sikchha par sandeh hain.Bandhuvar,prakhar hindu ke blog par aapki tippani se aisa lagata hai ke dango ke dawanal se aap achute hai,

Amit Mathur said...

मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी के लिए सुमनेश जी का धन्यवाद. ज्ञान तो ज्ञानियो की संगत से आता है. अपने संदेश को और विस्तार से मेरे ईमेल ईद saiamit@in.com पर भेज सकते हैं. मुझे प्रतीक्षा रहेगी. -अमित

BrijmohanShrivastava said...

प्रिय माथुर जी /रचना अच्छी लगी /नसरुद्दीन का जोक अच्छा लगा साथ ही यह भी जाना की आप ओशो को भी पढ़ते है =बहुत दार्शनिक चिंतन है उनका =आपकी लेखन शैली बहुत प्यारी है ऐसा लगता है जैसे तैरते चले जा रहे है =शांत नदी में सही है या तो गृहस्थी प्यार के सहारे चलती है या तब चलती है जब पति बहरा हो और पत्नी अंधी हो
आपने मुझे आदेशित किया था की ""अपने ब्लॉग का यूं आर एल जरूर देना " ये कैसा होता है और में कैसे दूँ =आपको ही बताने का कष्ट करना पड़ेगा वह भी ऐसे की पहले इसको दबाओ [मतलब बटन ] फिल ये खुलेगा फिर ये करना ,फिर वो करना ऐसे /इस कष्ट के लिए सह्रदय क्षमाकांक्षा स्वीकारें

prakharhindutva said...

I think you seem to be too self obsessed.... you can write over any subject whether it's society, TV soap or Bomb blast... Dear I am a reporter with a reputed channel in Delhi... and I ve covered all the blasts and Eid celebrations since 2005... Just tell me one thing.. Why every name of terrorist begins with Muhammad why he can't be Mahesh, Dinesh or Amit.... ecause Islam preaches violence and I ve listed that in my blog also... Please for the sake for our motherland... open your eyes blindfolded by outdated Gandhian thinking.... Believe in reality... In acchhi baaton se desh nahiin chalte.. na buddhijeevi kisi desh mein kranti la sake hain

Parmita Uniyal said...

Sukhee Dampatya ka ye formula bahut mazedaar laga. Agar har insaan aisa soche to zindagi bahut asaan ho jaayegi..Par dekha jaaye to vastavik jeevan mein parishthitiyan itni asaan nahi hoti.

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